3 साल पहले तीन दोस्त बैठके बाते कर रहे थे और बातो ही बातो में उनके मन में एक विचार आया की जो हम प्रतिदिन खाना खा रहे है क्या वो शुद्ध है जिस हवा में हम सांस ले रहे हैं क्या वो शुद्ध है। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वर्मीकम्पोस्ट( Vermi Composting) का काम शुरू किया और आज वो इसी काम से लाखो रुपये भी कमा रहे हैं और साथ में हमारे आने वाले भविष्य के लिए एक शुद्ध खाद भी तैयार कर रहे हैं जिससे उस खाद से जो हम खेती करेंगे वो बिना किसी कैमिकल के होगी और एक अच्छा खाना मिलेगा।

बिल्डर का काम छोड़कर की इस काम की शुरुआत":-

कर्मवीर अग्रवाल जी हमे बताते हैं की तीन साल पहले वो एक बिल्डर का काम करते थे। परन्तु हमारे देश और हमारे आसपास बढ़ती बीमारियों के चलते उनके मन में एक विचार आया की इन बढ़ती बीमारियो का कारण क्या है, आखिर क्यों ये इतनी बीमारियां बढ़ रही है,उन्होंने सोचा कि जब हम कोई भी चीज बाज़ार से खरीदके लाते है तो उन्हें देख के लाते है की वो अच्छी हैं और साफ़ है परन्तु फिर भी लोग बीमार हो रहें हैं। तो आखिर उसकी मुख्य वजह क्या है? इसी बात को लेकर उन्होंने रीसर्च शुरू की तो उन्होंने देखा की जो हम खाना रहे है आखिर वो खाना कहाँ से और किन किन रासायनिक पदार्थो का इस्तेमाल करके पैदा  है। 


क्या है वर्मीकम्पोस्ट(Vermicompost):-

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है। 


किन किन कठिनाइयों का करना पड़ा सामना:-

 यदि आप किसी काम को शुरू करते है तो आपको शुरआती कुछ दिनों में परेशानियों का सामना तो करना ही पड़ता हैं। जो व्यक्ति इन परेशानियों का  सामना डटके  कर लेता है वो कामयाब भी हो ही जाता है। कुछ इसी तरह  कहानी है अग्रवाल जी की,उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी उनका बैकग्राउंड खेती से न होना।  परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और वो लगन और मेहनत के साथ काम करते रहे,उसी लगन से आज वो कामयाब हैं। आगे हुई बातचीत में वो हमे बताते हैं की सबसे पहले तो उन्हें जानकारी का अभाव  होने की वजह से केंचुआ भी बहुत महंगा पड़ा और सबसेड बड़ी समस्या जो उन्हें आयी  पक्षियों द्वारा केंचुओ  को खाजाना। धीरे धीरे उन्होंने इन सभी चीजों का इंतजाम किया और अपने काम को सफल बनाया।  


3 तरीको से बेचते हैं वो अपना माल:-

अग्रवाल जी हमें बताते है की वो वर्मीकम्पोस्ट या केंचुआ खाद जो होता है उसे 3 तरीको से बेचते हैं।  
1.खुला खाद बेचना:-

उनके आसपास के किसानो को जिसको भी खाद की जरुरत होती है वो बिना पैकिंग वाला खाद ले जा सकता है जिससे उन किसानो  पड़ता है। खुले खाद की कीमत लगभग 5 रु प्रति किलो होती है।  

2. 5 किलो का पैकिट:-

जिस किसी किसान भाई ने अपनी नर्शरी या बागवानी की हुई है वो ये 5 किलो के पैकेट का ज्यादा इस्तेमाल  करते हैं।  इसकी कीमत लगभग 60 रु एक पैकेट की होती है। 

3. 50 किलो का पैकेट:-

उनका खाद अब अलग अलग राज्यों में भी जाता है। दूसरे राज्यों में जाने के लिए वो बड़े पैकिट तैयार करते हैं। इन 50 किलो के पैकेट की कीमत होती है 300 रु।  


केंचुआ खाद की विशेषताएँ:-

इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।

इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।

प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।

केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।


वर्मीकम्पोस्ट खाद का महत्व:-

यह भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।

वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।

पौधों तथा भूमि के बीच आयनों के आदान प्रदान में वृद्धि होती हैं।

वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-300% तक की वृद्धि हो सकती हैं।

केचुओं के शरीर का 85% भाग पानी से बना होता हैं इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर के पानी के कम होने के बावजूद जीवित रह सकते हैं तथा मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन प्रदान करते हैं।

मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं।

इसके प्रयोग से सिंचाई की लागत में कमी आती हैं।

लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम होती जा रही मिट्टी की उर्वरकता को इसके उपयोग से बढ़ाया जा सकता हैं।

इसके प्रयोग से फल, सब्जी, अनाज की गुणवत्ता में सुधार आता हैं, जिससे किसान को उपज का बेहतर मूल्य मिलता हैं।

केंचुए में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी का pH संतुलित करते हैं।

उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती हैं।


निष्कर्ष :-

इंसान अपनी लगन और मेहनत से क्या कुछ नहीं कर सकता। इसी तरह तीन दोस्तों ने कैसे मिलके तैयार किया वर्मीकम्पोस्ट और आज कमा रहे है करोडो रुपये,जानने के लिए निचे दी गयी वीडियो के लिंक जरूर क्लिक करें और आप भी कमा सकते हैं इन्ही की तरह लाखो करोड़ो।