लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत ही नहीं बलिक विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुये हैं इसमें प्रचुर मात्राा में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलावे प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस, विटामिन-सी इत्यादि पाये जाते हैं। इसका उपयोग डिब्बा बंद, स्क्वैश, कार्डियल, शिरप, आर.टी.एस., रस, लीची नट इत्यादि बनाने में किया जाता है।


लीची को भी सघन बागवानी के रूप में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है, परन्तु इसकी खेती के लिए विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है, जो देश के कुछ ही क्षेत्रों में है। अत: इसकी खेती बहुत ही सीमित भू-भाग में की जा रही है। देश में लीची की बागवानी सबसे अधिक बिहार में ही की जाती है। इसके अतिरिक्त देहरादून की घाटी उत्तर प्रदेश के तरार्इ क्षेत्र तथा झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में की जाती है। फलों की गुणवत्ता के आधार पर अभी तक उत्तरी बिहार की लीची का स्थान प्रमुख है।


जलवायु

जाड़े के दिनों में अधिक पाला तथा गर्मी के दिनों में गर्म हवाओ से लू को लीची से हानी होती है। पाले से नई और - कभी कभी पुरानी पत्तियां तथा टहनियां मर जाती है। फलों के पकने के समय लू चलने से इसके फलों में फटन आ जाती है। जिससे फल ख़राब होकर गिरने लगते है। अगेती किस्मों में फल सूर्य कि कड़ी धुप से झुलस जाते है और फट भी जाते है। जिसे सनस्काल्ड कहते है। यह हानी उस समय अधिक होती है। जब तापक्रम 38 डि से अधिक हो जाता है और हवा में आद्रता 60 प्रतिशत से कम हो जाती है। इसलिए उन क्षेत्रों में जहाँ 38 डि से अधिक हो जाये और आद्रता तापक्रम 60 प्रतिशत से कम हो जाये , लीची कि खेती सफलतापूर्वक करना संभव नहीं है। 38 डि से कम तापक्रम और 150 सेमी 0 वर्षा वाले क्षेत्र जहाँ आद्रता 60 प्रतिशत से ऊपर हो , लीची कि खेती के लिए उत्तम है।


भूमि

उसर भूमि छोड़कर सभी प्रकार कि भूमियों में जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छी मात्रा में हो और जल निकास अच्छा हो लीची कि खेती सफलतापूर्वक कि जा सकती है। चिकनी दोमट मिटटी जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छा हो और पानी न ठहरता हो लीची के लिए सर्वोत्तम है। हल्की अम्लीय भूमि में पेड़ों कि बृद्धि अच्छी होती है। ऐसी भूमि में लीची कि जड़ो के ऊपर कुछ गांठे पाई जाती है। जिनमे माइकोराइजा नामक कवक पाई जाती है। जिस कारण वृक्षों कि वृद्धी अच्छी होती है।


प्रजातियाँ

भारत में अभी तक लीची कि सिमित जातियां ही उपलब्ध है , जिसका मुख्य कारण इसका भारत में देर से प्रवेश है यहाँ पर व्यापारिक स्तर कि कुछ प्रमुख प्रजातियाँ दी जा रही है जो निम्न प्रकार है : -

1. अर्ली सीडलेस अर्ली बेदाना - इसके फल जून के दुसरे सप्ताह में पकते है। फुल हृदयाकार से अंडाकार शक्ल के होते है । प्रति फल औसत भार 21.67 ग्राम होता है। छिलका पतले गहरे लाल रंग का होता है। प्रतिफल गुदे का भार लगभग 18 ग्राम , गुदा मुलायम रंग सफ़ेद क्रीमी तथा 13.64 प्रतिशत व अम्ल 0 शर्करा . 436 % होता है। फल खाने में स्वादिष्ट एवं सुगन्धित होता है। बिज बहुत छोटा और फलत बहुत अच्छी होती है।

2. रोज सेंटेड - इसके फल भी जून के दुसरे सप्ताह में पकते है फल पके हृदयाकार 3.12 लगभग से.मी. लम्बे 3.05 ओर से.मी. चौड़े होते हैएक फल का औसत भार 17.45 ग्राम होता है। छिलका पतला व बैगनी रंग का मिश्रित होता है। गुदा मुलायम रंग में भूरा सफ़ेद तथा प्रति फल औसत भार 13.29 ग्राम होता है गुदे में शर्करा कि मात्रा लगभग 12.79 % अम्ल कि मात्रा 0.33 % होती है फल खाने से मीठा और गुलाब कि तरह खुशबू युक्त होता है। बिज आकार में बड़ा होता है फल उत्पादन उपज सामान्य होता है।

3. अर्ली लार्ज रेड - फल जून के तीसरे सप्ताह में पकता है। फल तिरक्षा हृदयाकार लगभग 3.53 सेमि . लम्बे 3.03 से.मी. चौड़े होते है तथा फल का औसत भार 20.45 ग्राम होता है छिलका पतला , गहरे लाल रंग का गुदा कड़ा भूरा सफ़ेद शर्करा 10 0.88 % 0.41 % अम्लता खुशबू अच्छी और स्वाद मीठा होता है। बिज आकार में बड़ा और फलत मध्यम होता है।


पौधा रोपण

यह कार्य भी परम्परागत बागवानी के तरह ही की जाती है।


सिंचार्इ

नये पौधे में थोड़ा-थोड़ा पर जल्दी-जल्दी सिंचार्इ की आवश्यकता होती है। अत: शुरू के दो वर्षों तक वर्षा शुरू होने से पहले सप्ताह में एक बार अच्छी सिंचार्इ करनी चाहिए।


कटार्इ-छँटार्इ

सघन बागवानी के अंतर्गत लीची के पेड़ों में फल क्षेत्र को बढ़ाना, वृक्ष उँचार्इ का प्रबंधन इत्यादि प्रमुख है। अत: शुरूआत से ही वृक्ष को उचित आकार प्रदान करना तथा फलदार वृक्ष में फल तुड़ार्इ के बाद शाखाओं की छँटार्इ करना काफी महत्वपूर्ण है। लीची में एक साल के पौधे की 40-50 सेमी पर शीर्ष कटिंग किया जाना चाहिए । यह कार्य अगस्त सितम्बर में करना चाहिए। कटिंग के तुरंत बाद बोरडेक्स मिश्रण या कापर आक्सीक्लोराइड का लेप लगाना चाहिए । सशक्त तथा अच्छी दूरी वाले बाहरी प्ररोहों को मुख्य शाखा का गठन करने दिया जाए। मुख्य शाखा के साथ क्रोचेज बना रही सभी शाखाओं की छँटार्इ कर इसे नियमित आकार देना चाहिए। जब वृक्ष फलन में आ जाए तब फल तुड़ार्इ के समय 25-30 सेमी लम्बी फल-शाखाओं को हटा देना चाहिए। इस प्रकार 2-3 नए सिरे विकसित होंगे जिसके फलस्वरूप अगले मौसम में फलदार शाखाएँ विकसित होती है।


सावधानियां

जैसा कि ऊपर पहले ही बताया जा चुका है कि लीची के पौधों में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। इसलिए रोपाई करते समय निम्न सावधानियां रखना आवश्यक है -

खेत में केवल वही पौधे लगाये जाये तो पेड़ से गुटी काटने के बाद कम से कम 6 से 8 माह तक गमलो में अथवा भूमि में लगाये गए हो क्योंकि लीची कि गुटी पेड़ से अलग होने के पश्चात् बहुत कम अधिक जीवित रह पाती है। और कभी - कभी तो 60 प्रतिशत तक मर जाती है। इस प्रकार पुराने पौधे भी खेत में लगाने के बाद शत प्रतिशत जीवित नहीं रह पाते है।

जहाँ तक संभव हो लीची के दो वर्ष के पौधे खेत में लगाये जाना चाहिए, इससे कम पौधे मरेंगे।

रोपाई के समय पौधे को गड्ढ़े में रखकर उसके चारों और खाली जगह में बारीक़ मिटटी डालकर इतना पानी डाल देना चाहिए कि गड्ढ़ा पानी से भर जाये। इससे मिटटी नीचे बैठ जाएगी और खाली हुए गड्ढ़े में : पुन बारीक़ मिटटी डालकर गड्ढ़े को जमीन कि सतह तक भर देना चाहिए।

पेड़ के चारों और मिटटी डालकर मिटटी को हाथ से नहीं दबाना चाहिए क्योंकि इससे : प्राय पौधे कि मिटटी का खोल पिंडी टूट जाती है । जिससे पौधे कि जड़ टूट जाती है। और पौधा मर जाता है। इसलिए मिटटी को पानी द्वारा उपरोक्त विधि से सेट कर भर देना चाहिए ।

लीची का नया बाग लगने हेतु गड्ढ़ों को भरते समय जो मिटटी व खाद आदि का मिश्रण बनाया जाता है उसमे लीची के बाग़ कि मिटटी अवश्य मिला देना चाहिए क्योंकि लीची कि जड़ों में एक प्रकार कि कवक जिसे माइकोराइजा कहते है पाई जाती है। इस कवक द्वारा पौधे अच्छी प्रकार - फलते फूलते हैऔर नए पौधे में भी कवक अथवा लीची के बाग़ कि मिटटी मिलाने से मृत्युदर कम हो जाती है।



पोषण प्रबंधन

प्रारम्भ के 2-3 वषो तक लीची के पौधे को 30 किग्रा सड़ी हुर्इ गोबर की खाद 2 किग्रा करंज की खल्ली, 200 ग्राम यूरिया, 150 ग्राम सि.सु. फास्फेट तथा 150 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति पौधे प्रति वर्ष की दर से देना चाहिए। तत्पश्चात पौधे की बढ़वार के साथ-साथ खाद की मात्रा में वृद्धि करते जाना चाहिए। पूरी खाद एवं उर्वरकों को जून तथा शेष उर्वरकों को सितम्बर में वृक्ष के छत्राक के नीचे गोलार्इ में देकर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। खाद देने के बाद सिंचार्इ अवश्य करनी चाहिए। जिन बगीचों में जिंक की कमी के लक्षण दिखार्इ दे उनमें 150-200 ग्राम जिंक सल्फेट प्रति वृक्ष की दर से सितम्बर माह में देना लाभकारी पाया गया है।


समस्याएँ एवं निदान

फलों का फटना : फल विकसित होने के समय भूमि में नमी की कमी और तेज गर्म हवाओं से फल अत्यधिक फटते हैं, यह समस्या फल विकास की द्वितीय अवस्था में आती है। जिसका सीधा सम्बन्ध भूमि में जल स्तर तथा नमी की क्षमता से भी है। इससे बचने के लिए भूमि में नमी बनाए रखने के लिए अप्रैल के प्रथम सप्ताह से फलों के पकने एवं उनकी तुड़ार्इ तक बाग की हल्की सिंचार्इ एवं पौधे पर जल छिड़काव करना चाहिए। यह भी देखा गया है कि अप्रैल में पौधे पर 10 पी.पी.एम., एन.ए.ए. एवं 0.4 प्रतिशत बोरेक्स के छिड़काव से भी फलों के पफटने की समस्या कम होती है।

लीची की मकड़ी ;लीची माइटद्ध : मकड़ी के नवजात एवं वयस्क दोनों ही केामल पत्तियों की निचली सतह, टहनियों तथा पुष्पवृन्त से चिपक कर लगातार रस चूसते हैं जिससे पत्तियाँ मोटी, लेदरी होकर मुड़ जाती है अैर उन पर मखमली रूआँ-सा निकल जाता है जो बाद में भूरे या काले रंग में परिवर्तित हो जाता है तथा पत्ती में गडढे बन जाते हैं। इसके निराकरण के लिए फल तुड़ार्इ के बाद जून में ग्रसित पत्तियों एवं टहनियों को काटकर जला देना चाहिए। सितम्बर-अक्टूबर में नर्इ कोपलों के आगमन के समय कैल्पेन 0.05 प्रतिशत या नुवान के घोल का 7-10 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करना चाहिए।