अश्वगंधा या असगंद एक सीधा बढ़नेवाला, शाखाओं वाला छोटा पौधा है जिसकी सामान्य लंबाई 1.4 से 1.5 मीटर तक होती है। यह पौधा उपोष्णकटिबंधीय और सूखे क्षेत्रों में अच्छी तरह बढ़ता है। अश्वगंधा एक कठोर और सूखा बर्दाश्त करनेवाला पौधा है। अश्वगंधा ”इंडियन जिनसेन” या ” जहरीला करौंदा/प्वॉइजन गुजबेरी” या ”विंटर चेरी” और भारत के उत्तर-पश्चिमी और मध्य हिस्से में उपजने वाले देसी दवाई के पौधे के तौर पर भी जाना जाता है।


अश्वगंधा जड़ी-बूटी या औषधि बहुत महत्वपूर्ण और प्राचीन है जिसकी जड़ों का इस्तेमाल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली जैसे आर्युवेद और यूनानी में दवाओं के रूप में किया जाता रहा है। अश्वगंधा औषधि ”सोलेनसिया” परिवार और ”विथानिया” प्रजाति का होता है और इसका वैज्ञानिक नाम ”विथानिया सोमानिफेरा” है। अश्वगंधा की पत्तियां हल्की हरी, अंडाकार, सामान्य तौर पर 10 से 12 सेमी लंबी होती हैं। सामान्यतौर पर इसके फूल छोटे, हरे और घंटे के आकार के होते हैं। आमतौर पर पका हुआ फल नारंगी और लाल रंग का होता है। अश्वगंधा की व्यावसायिक खेती में खेती प्रबंधन और उपयुक्त बाजार मॉडल बनाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं। अश्वगंधा की पौधे का जड़ और पत्ती के बीज का इस्तेमाल किया जाता है।


भारत में अश्वगंधा के बड़े उत्पादक राज्य

इस फसल के मुख्य उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश है।


अश्वगंधा की किस्में

”जवाहर” जो कि संरचना में छोटे और काफी लचीले होते हैं उच्च घनत्व वाले पौधारोपन के लिए हैं। सूखी जड़ों में विदेनोलाइड की कुल मात्रा 0.30 फीसदी होती है जिससे यह किस्म छह महीने में पैदावार देती है।


भूमि एवं जलवायु

अश्वगंधा खरीफ (गर्मी) के मौसम में वर्षा शुरू होने के समय लगाया जाता है। अच्छी फसल के लिए जमीन में अच्छी नमी व मौसम शुष्क होना चाहिए। फसल सिंचित व असिंचित दोनों दशाओं में की जा सकती है। रबी के मौसम में यदि वर्षा हो जाए तो फसल में गुणात्मक सुधार हो जाता है। इसकी खेती सभी प्रकार की जमीन में की जा सकती है। केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल में किए गए परीक्षणों से पता चला है कि इसकी खेती लवणीय पानी से भी की जा सकती है।

लवणीय पानी की सिंचाई से इसमें एल्केलोइड्‌स की मात्रा दो से ढाई गुणा बढ़ जाती है। इसकी खेती अपेक्षाकृत कम उपजाऊ व असिंचित भूमियों में करनी चाहिए। विशेष रूप से जहां पर अन्य लाभदायक फसलें लेना सम्भव न हो या कठिन हो। भूमि में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। फसल की अच्छी बढ़वार के लिए शुष्क मौसम व तापमान 350 ब से अधिक नहीं होना चाहिए। इस फसल के लिए 500 से 700 मि.मी वर्षा वाले शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र उपयुक्त हैं।


बुवाई का समय एंव बीज की मात्रा

अगस्त और सितम्बर माह में जब वर्षा हो जाऐ उसके बाद जुताई करनी चाहिये। दो बार कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद पाटा लगा देना चाहिये। 10-12 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। अच्छी पैदावार के लिये पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी0 तथा लाइन से लाइन की दूरी 20 सेमी0 रखना चाहिये।


प्रजातियॉ: पोषिता, जवाहर असगंध-20, जवाहर असगंध-134


बीज प्रवर्धन

अश्वगंधा की पौधा जुलाई-सितम्बर में फूल आता ह और नवम्बर-दिसम्बर में फल लगता है। अश्वगंधा की पौधे के फल से बीज निकालकर उसे सूर्य के रोषनी में सुखने दिया जाता है। बुवाई के पहले बीजों को 24 घण्टे के लिये ठण्डे पानी में भिगो दिया जाता है तथा उसे छिड़काव विधि द्वारा तैयार बीजों को सीधे खेत में बो दिया जाता है और हल्के मिट्टी से ढक दिया जाता है। अश्वगंधा को संकन क्यारी में भी बोया जाता है और दूरी 5 सेन्टीमीटर रखा जाता है। अश्वगंधा की बुवाई खरीफ में जुलाई से सितम्बर तथा रबी में अक्टूबर से जनवरी में बोया जाता है। अश्वगंधा का अंकुरण 6 से 7 दिनों में 80 प्रतिशत होताहै।


भूमि की तैयारी व बुआई

वर्षा होने से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर लें। बुआई के समय मिट्‌टी को भुरभुरी बना दें। बुआई के समय वर्षा न हो रही हो तथा बीजों में अकुंरण के लिए पर्याप्त नमी हो। वर्षा पर आधारित फसल को छिटकवां विधि से भी बोया जा सकता है। अगर सिचिंत फसल ली जाए तो बीज पंक्ति से पंक्ति 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 से. मी. रखने पर अच्छी उपज मिलती है तथा उसकी निराई-गुडाई भी आसानी से की जा सकती है। बुआई के बाद बीज को मिट्‌टी से ढक देना चाहिए। अश्वगंधा की फसल को सीधे खेत में बीज द्वारा अथवा नर्सरी द्वारा रोपण करके उगाया जा सकता है। नर्सरी तैयार करने के लिए जून-जुलाई में बिजाई करनी चाहिए। वर्षा से पहले खेत को 2-3 बार जुताई करके मिट्‌टी को अच्छी तरह भुरभुरी बना देना चाहिए। बुआई के तुरन्त बाद फुआरे से हल्का पानी लगा दें। एक हेक्टेयर के लिए 5 किलो बीज की नर्सरी उपयुक्त होगी। बोने से पहले बीजों को थीरम या डाइथेन एम-45 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से अकुंर बीज जनित रोगों से सुरक्षित रहते है। बीज 8-10 दिन में अंकुरित हो जाते है। अकुंरण के बाद उनकी छटाई कर लें। पौधों की ऊंचाई 4 से 6 सें. मी. होने पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सें. मी. की कर देनी चाहिए ।


खाद एवं उर्वरक

अश्वगंधा की फसल को खाद एवं उर्वरक अधिक आवश्यकता नहीं रहती है। पिछले फसल के अवशेष उर्वरकता से खेती किया जाता है।इसके लिए सिर्फ गोबर की सड़ी खाद पर्याप्त होती है।


सिंचाई

सिंचित अवस्था में खेती करने पर पहली सिंचाई करने के 15-20 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। उसके बाद अगर नियमित वर्षा होती रहे तो पानी देने की आवश्यकता नही रहती। बाद में महीने में एक बार सिंचाई करते रहना चाहिए। अगर बीच में वर्षा हो जाए तो सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती। वर्षा न होने पर जीवन रक्षक सिंचाई करनी चाहिए। अधिक वर्षा या सिंचाई से फसल को हानि हो सकती है। 4 ई.सी. से 12 ई.सी. तक वाले खारे पानी से सिंचाई करने से इसकी पैदावार पर कोई असर नही पड़ता परन्तु गुणवत्ता 2 से 2.5 गुणा बढ़ जाती है।


अश्वगंधा फसल में पौधारोपन

अश्वगंधा फसल की पैदावार बीज के माध्यम से होता है। बीमारी मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाला बीज खरीद कर अच्छी तरह से तैयार नर्सरी में लगाना चाहिए। हालांकि इसे मुख्य खेत में सीधे ब्रॉडकास्ट मेथड यानी छिड़काव कर लगाया जा सकता है। अच्छी गुणवत्ता हासिल करने के लिए ट्रांसप्लान्टिंग यानी आरोपन को चुना जाता है ताकि वो निर्यात के लिए बेहतर हों। निर्यात की गुणवत्ता के लिए एक अच्छी प्रबंधित नर्सरी जरूरी है। सामान्य तौर पर जमीन से उपर उठे नर्सरी बेड को गार्डन कंपोस्ट और बालू को मिलाकर तैयार करना चाहिए। मुख्य खेत में एक हेक्टेयर में पौधारोपन के लिए पांच किलो बीज चाहिए। नर्सरी की स्थापना जून और जुलाई महीने में करनी चाहिए। मॉनसून की शुरुआत से पहले ही बीज लगा देना चाहिए और बालू का इस्तेमाल करते हुए हल्के ढंग से ढंक देना चाहिए। सामान्यतौर पर छह से सात दिन में बीज में अंकुरन हो जाता है। करीब 35 से 40 दिन पुराने पौधे को मुख्य खेत में रोपा या लगाया जा सकता है।

मिट्टी में खाद को मिलाने के बाद रिज को 50 से 60 सेमी की दूरी का ध्यान रखते हुए तैयारी करनी चाहिए। 35 से 40 दिन पुराना स्वस्थ पौधे को 30 सेमी की दूरी पर लगाना चाहिए। एक एकड़ में करीब 55 हजार पौधारोपन के लिए 60 सेमी गुना 30 सेमी दूरी रखी जानी चाहिए।


कटाई एवं उपज

अश्वगंधा की कटाई जनवरी से मार्च तक लगातार चलता रहता है। अश्वगंधा पौधे को उखड़ा जाता है उसे जड़ों को पौधे के भागों को काटकर अलग किया जाता है और जड़ों को 7 से 10 सेन्टीमीटर लंबाई तक काटकर छोटे-छोटे टुकड़े किये जाते है जिससे आसानी से उसे सुखाया जा सके। पौधे के पके फल से बीज एवं सुखे पतियॉ प्राप्त किया जाता हैं।


उपज

अश्वगंधा की 600-800 किलोग्राम जड़ तथा 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है ।


अश्वगंधा की पैदावार

फसल की पैदावार मिट्टी की ऊर्वरता, सिंचाई और खेत प्रबंधन के तौर-तरीकों समेत कई तत्वों पर निर्भर करता है। एक औसत के हिसाब के प्रति एकड़ जमीन से करीब 450 किलोग्राम जड़ें और 50किलोग्राम बीज हासिल किया जा सकता है।


अश्वगंधा का बाजार

अश्वगंधा के बाजार के लिए मध्य प्रदेश का नीमच और मंदसौर पूरी दुनिया में मशहूर है। देश से आयातक, खरीदार, प्रोसेसर, पारंपरिक व्यापारी, आयुर्वेदिक और सिद्धा ड्रग मैन्यूफ्रैक्चरर प्रति साल यहां आते हैं और अश्वगंधा की जड़ खरीद कर जाते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से पहले, बाजार को खोजना और उसकी स्थापना करना है। हर्बल, आयुर्वेदिक कंपनियों से संपर्क करना बेहतर विकल्प है। यहां सूखी जड़ें 90 रुपये और बीज 75 रुपये प्रतिकिलो बेची जाती है।