लम्बे समय तक सुगंधित तथा ताजा बने रहने के कारण रजनीगंधा के खुले फूलों और कर्त्तन फूलों का पुष्पविन्यास बनाने, माला बनाने, फूलदान में रखने तथा सजाने में बहुतायत में उपयोग होता है। इसके फूलों से अच्छी और शुद्ध किस्म के 0.08 से 0.135% तेल भी प्राप्त होता है, जिसका उपयोग इत्र या परफ्यूम बनाने में किया जाता है, जो दूसरे इत्र या परफ्यूम से महँगे होते हैं। इन्हीं सभी कारणों से बाजार में इसकी माँग ज्यादा होती है।


हालांकि जैसा की इसके नाम से ही स्पष्ट है रजनीगंधा का अंग्रेजी में अर्थ ‘’Night Fragrant’’ यानि रातों को सुगन्धित कर देने वाला होता है । और इसका अंग्रेजी नाम भी इस फूल की आकृति को देखते हुए ही पड़ा चूँकि यह फूल ट्यूब की आकृति का होता है इसलिए इसे Tuberose कहा जाता है। रजनीगंधा का अधिकतर उपयोग खुशबूदार तेलों के निर्माण एवं माला इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है । लेकिन इसके अलावा रजनीगंधा के फूल का उपयोग इत्र उद्योग एवं कुछ दवाइयां बनाने में भी किया जाता है। इसका उपयोग सूजाक (Gonorrhea) नामक यौन रोग जिसमे मूत्रमार्ग या योनि से उत्तेजक पदार्थ निकलता है के उपचार में किया जाता है । इसके अलावा रजनीगंधा के कुछ बल्बों को हल्दी एवं मक्खन के साथ मिलाकर छोटे बच्चों के जन्मजात लाल Pimples पर लगाने से इस समस्या को भी दूर किया जा सकता है। यही कारण है की रजनीगंधा नामक इस फूल की मांग हमेशा किसी न किसी आवश्यकतानुसार बनी रहती है । इसी आवश्यकता को ध्यान में रकते हुए जब किसी उद्यमी द्वारा रजनीगंधा के फूलों का उत्पादन किया जाता है तो उसके द्वारा किये जाने वाले उस व्यवसाय को रजनीगंधा की खेती या फार्मिंग कहा जाता है।



रजनीगंधा की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

रजनीगंधा एक शीतोष्ण जलवायु का पौधा है । लेकिन ओसत जलवायु में इसकी खेती सालभर कि जा सकती है। रजनीगंधा के उचित विकास और वृद्धि के लिए मौसम का तापमान 20 से 30 डिग्री का होना चाहिए। ऐसे स्थान जंहा दिन और रात के तापमान में अधिक अंतर ना हो उन स्थानों पर सारे साल इसकी खेती की जाती है। रजनीगंधा को व्यावसायिक रूप से पश्चिमी बंगाल , कर्नाटक , तमिलनाडू , महाराष्ट्र . उत्तरप्रदेश , हरियाणा , पंजाब और हिमाचल प्रदेश में खेती कि जाती है। भारत के मैदानी भागों में इसे अप्रैल से सितम्बर के महीने में उगाया जाता है। जबकि पहाड़ी भागों में जून से सितम्बर के महीने में फूल निकलने लगते है। रजनीगंधा के पौधे को कंद द्वारा उगाया जाता है। इसके पौधे पर 80 से 90 दिनों के बाद फूल आने लगते है।



भूमि का चुनाव और तैयारी

रजनीगंधा की खेती समस्त हलकी से भारी (जो हलकी अम्लीय या क्षारीय है ) में की जा सकती है अच्छे वायु संचार एवं जल निकास युक्त ६.५-७.५ पी.एच. मान वाली बलुअर दोमट अथवा दोमट भूमि अति उपयुक्त होती है खेत की अच्छी तैयारी एवं जल निकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है |रजनीगंधा के लिये भूमि का चुनाव करते समय 2 बातों पर विशेष ध्यान दें। पहला, खेत या क्यारी छायादार जगह पर न हो, यानी जहां सूर्य का प्रकाश भरपूर मिलता हो। दूसरा, खेत या क्यारी में जल निकास का उचित प्रबंध हो। सब से पहले खेत, क्यारी व गमले की मिट्टी को मुलायम व बराबर कर लें, चूंकि यह कंद बीज वाली किस्म है, अत: कंद के समुचित विकास के लिये खेत की तैयारी विधिवत होनी चाहिए। खासकर मिट्टी को खरपतवार रहित कर लें, अन्यथा निराई करने में बडी कठिनाई होगी।



प्रजातियां

फ़ूल के आकारप्रकार, पत्तियों के रंग के अनुसार इसे 3 वर्गो में बांटा गया है

सिंगल : मैक्सिकन सिंगल, मैक्सिकन एवरब्लूमिंग तथा कलकत्ता सिंगल के फ़ूल सफ़ेद रंग के होते हैं तथा इन में पंखडियों की केवल एक ही पंक्ति होती है।

डबल : कलकत्ता डबल सफ़ेद फ़ूल तथा पंखडियों का ऊपरी सिरा हलका गुलाबी रंग लिए होता है। पंखडियां कई पंक्तियों में सजी होती हैं, जिस से फ़ूल का केंद्रबिंदु दिखाई नहीं देता।

अर्धडबल : स्वर्णलता यह डबल किस्म की तरह ही है, परंतु पंखडियों की संख्या कम, केवल 4-5 की पंक्ति होती है। इस की पंक्तियों के आकर्षक रंगो एवं विविधता के कारण ही इसे क्रमश: स्वर्णरेखा और रजतरेखा के नामों से जाना जाता है।



खेत तैयारी

दो तीन बार खेत की जुताई कर 6-8 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से मिलानी चाहिए। खेत की तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि मिट्टियाँ भुरभुरी हो जाएँ। खेत में खरपतवार तथा पुरानी फसल के अवशेष को निकाल कर अपनी आवश्यकता अनुसार क्यारियाँ बनानी चाहिए, जिससे कि सिंचाई की व्यवस्था अच्छी हो सके।



बल्व लगाने का समय

भारत में रजनीगंधा को मैदानी भागों में फरवरी-मार्च तथा पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल-मई में लगाया जता है। मार्च-जून में लगाए गए पौधे में लम्बे और अच्छे फूल खिलते हैं।



दूरियाँ

पौधों की संख्या पर उपज, गुणवत्ता निर्भर करती है तथा बल्व के उत्पादन पर भी प्रभाव डालती है। ज्यादा घनत्व वाले पौधों में फूल तथा बल्व ज्यादा निकलते हैं। 20 X 20 सें.मी. की दूरी पर पौधे को लगाने से अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इतनी दूरी रखकर एक लाख पौधे प्रति एकड़ में लगाए जाते हैं। फूलों से तेल उत्पादन के लिए 20 X 15 सें.मी. की दूरी पर पौधों को लगाना चाहिए।



रजनीगंधा के बीजों की बुआई करने का तरीका

रजनीगंधा के कंदों का रोपण मार्च – अप्रैल या मई के महीने में किया जाता है। बुआई के लिए हमेशा स्वस्थ और ताज़े कंद ही उपयोग करना चाहिए। रजनीगंधा की सालभर फूल लेने के लिए हर 15 दिन के बाद कंद का रोपण करना चाहिए। कंद के २ सेंटीमीटर के व्यास के आकार या उससे बड़ा हिस्सा काट कर रोपण के लिए प्रयोग करें। भूमि की संरचना के अनुसार 5 से 8 सेंटीमीटर की गहराई में कंदों की बुआई करें। इसकी बुआई करते समय दूरी का ध्यान रखे। एक कतार से दुसरे कतार की दुरी 25 से 30 सेंटीमीटर कि रखें और एक कंद से दुसरे कंद की बुआई 10 से 12 सेंटीमीटर की दुरी पर करें। रोपण करते समय भूमि में नमी होनी चाहिए।

इसलिए खेत में रोपण करने से पहले ये सुनिश्चित कर लें कि भूमि में पर्याप्त मात्रा में नमी है या नहीं।



खाद और उर्वरक

रजनीगंधा की फसल में फूलों की अधिक पैदावार लेने के लिए उसमे आवश्यक मात्रा में आर्गनिक खाद,कम्पोस्ट खाद का होना जरुरी है इसके लिए एक एकड़ भूमि में 25-30  टन गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद देना चाहिए ।बराबर-बराबर मात्रा में नाइट्रोजन 3 बार देना चाहिए। एक तो रोपाई से पहले, दूसरी इस के करीब 60 दिन बाद तथा तीसरी मात्रा तब दें जब फ़ूल निकलने लगे। (लगभग 90 से 120 दिन बाद) कंपोस्ट, फ़ास्फ़ोरस और पोटाश की पूरी खुराक कंद रोपने के समय ही दे।



खरपतवार नियन्त्रण

खरपतवार रजनीगंधा खेती के लिए बहुत बड़ी समस्या है। पौधा लगाने के पहले खेत में डायुरान (80%) 1.12 किलो/एकड़ या एट्राजीन 1.2 किलो/एकड़ की दर के व्यवहार करने से खरपतवार कम निकलते हैं।



सिचाई

बल्ब रोपण के समय पर्याप्त नमी होना आवश्यक है जब बल्ब के अंखुए निकलने लगे तब सिचाई से बचाना चाहिए गर्मी के मौसम में फसल में 5-7 दिन तथा सर्दी के मौसम में 10-12 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार सिचाई करें सिचाई की योजना मौसम की दशा फसल की वृद्धि अवस्था तथा भूमि के प्रकार को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ।



कीट नियंत्रण

रजनी गंधा में कीड़े एवं बीमारियाँ नहीं लगती है कीट नियंत्रण के लिए नीम का काढ़ा गौमूत्र के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर २५० मि.ली. प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करना चाहिए।



कटाई /खुदाई

रजनी गंधा में 3-5 माह के बाद फूल आते है कटफ्लावर प्राप्त करने के लिए पूरी स्पाईक पौधे से काटकर अलग करते है स्पाईक काटने से पूर्व उस पर एक या दो जोड़े फूल खिल जाने पर ही उसे काटे।

लूज फूलों और उनसे तेल पाप्त करने के लिए उन्हें स्पाईक से तब जोड़े जब फूल पूरी तरह से खिले हो।

औसतन प्रति दिन 2-6 फ्लोरेट / स्पाईक तोडा जा सकता है इस प्रकार 50 किलो फ्लोरेट प्रति हे. काटा जा सकता है।



उपज

प्रथम वर्ष में फूलों की पैदावार 150-200 क्विंटल प्रति हे. के आसपास रहती है। जबकि दुसरे वर्ष में 200-250 क्विंटल तक होती है । इसके बाद पैदावार घट जाती है। रजनी गंधा की फसल से 2-3 लाख प्रति हे. या 15-20 टन लूज फ्लावर और 15-20 टन प्रति हे. बल्ब तथा लेट्स अतिरिक्त आमदनी देते है।