अनानास संसार के महत्वपूर्ण फलों में है और इसकी खेती मुख्य फसल या अन्र्तर्पसल के रूप में की जा सकती है। बिहार में इसकी खेती पूर्णिया एवं सहरसा जिले में सफलतापूर्वक की जाती है। इस फल में सभी प्रकार के लवण तथा विटामिन ए, बी एवं सी पाये जाते हैं।


इसका उपयोग ताजा फलों को खाने में डिब्बाबंद, सिरप, पेस्ट्री फैक्ट्री में, रस, जैम, स्क्वैश, नेक्टर इत्यादि बनाने में किया जाता है।



अनानास के सघन बागवानी के मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं।

1. उपज में वृद्धि होती है।

2. खरपतवार कम निकलते हैं।

3. पौधा सघन रहने के कारण फलों को धूप से क्षति नहीं होता है।

4. अधिक संख्या में पौधे प्राप्त होता है।

5. पौधा सघन रहने से तेज हवा का प्रभाव कम पड़ता है, जिससे कि पौधे कम गिरते हैं।

6. मिटटी में पानी का वाष्पीकरण कम होता है।



क्षेत्र

भारत में अनानास की वाणिज्यिक खेती वापस बारे में केवल चार दशकों से शुरू कर दिया। अनानास मध्यम वर्षा और अनुपूरक सुरक्षात्मक सिंचाई के साथ आंतरिक मैदानी इलाकों में व्यावसायिक तौर पर विकसित किया जा सकता है उच्च वर्षा और प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर- पूर्वी के पर्वतीय क्षेत्रों में से नम तटीय क्षेत्रों में खेती की जा रही है। यह एक छोटे पैमाने पर गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश में है, जबकि एक बड़े पैमाने पर असम, मेघालय , त्रिपुरा, मिजोरम, पश्चिम बंगाल, केरल , कर्नाटक और गोवा में उगाया जाता है।



मिट्टी

अनानस किसी भी प्रकार मिट्टी में हो जाता है।  5.5-6.0 के पीएच रेंज के साथ अम्लीय मिट्टी अनानास की खेती के लिए इष्टतम माना जाता है। भारी मिट्टी मिट्टी उपयुक्त नहीं है। यह रेतीले जलोढ़ या लेटराइट मिट्टी में विकसितहो जाता हैं।



जलवायु

एक भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में अनानास के विकास के लिए सबसे अच्छा मौसम है। जहाँ वर्षा 500mm होने क्षेत्रों में विकसित कर सकते हैं, हालांकि इष्टतम वर्षा प्रति वर्ष 1500mm है। फल इतने लंबे समय के तापमान 15.5-32.50 सी कम तापमान, चमकदार धूप और कुल छाया हानिकारक होते है।



सीजन

अनानस एक नम उष्णकटिबंधीय संयंत्र है। यह 900 मीटर से अधिक नहीं मैदानों में और भी ऊंचाई पर है, दोनों अच्छी तरह से बढ़ता है। यह बहुत ही उच्च तापमान और न ही ठंढ न तो बर्दाश्त । अनानस आमतौर पर अप्रैल फरवरी से फूलों और फलों जुलाई से सितंबर के लिए उपयुक्त रहता हैं।



सिंचार्इ

अनानास के पौधे को नमी की काफी आवश्यकता होती है इसलिए जाड़े में 10 दिनों पर एवं गर्मी में सप्ताह में एक बार सिंचार्इ अवश्य करनी चाहिए।



खाद एवं उर्वरक

200 किवंटल कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त 680 किग्रा अमोनियम सल्पफेट, 340 किग्रा फास्फोरस तथा 680 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से साल में दो बार डालना चाहिए। पहली बार मानसून के आने पर तथा दूसरी बार बरसात के खत्म होने पर सितम्बर-अक्टूबर में डालना चाहिए।



पौधा रक्षा

अनानास बहुत ही सख्त पौधा है, जिस पर कीड़े एवं बीमारियों का कम प्रकोप होता है। इसमें मुख्यत: मिली बग और जड़सड़न रोग होने की संभावना रहती है। इसके रोकथाम के लिए उचित कीटनाशक का व्यवहार करना चाहिए एवं जड़ सड़न से बचने के लिए रोपने के पूर्व पुत्तलों की जड़ों की पास पीली पत्तियों को हटा देना चाहिए तथा पोटाशियम परमैगनेट के 5 प्रतिशत या एगेलौल के घोल में छोटे सिरे को डुबोकर 4-5 दिनों तक उन्हें धूप में सुखाना चाहिए।



जल प्रबंधन

अनानास वर्षा आधारित शर्तों के तहत ज्यादातर बड़े हो जाता है, अनुपूरक सिंचाई इष्टतम वर्षा होने क्षेत्रों में अच्छा आकार फलों के उत्पादन में मदद कर सकते हैं। अल्प वर्षा वाले क्षेत्रों और साल में और गर्म मौसम के दौरान, सिंचाई (जहां सुविधाओं के मौजूदा हैं) अनानास40 दिनों के बाद सिंचाई की जाती है।



प्लांट का संरक्षण

अनानास बहुत ही सख्त पौधा है, जिस पर कीड़े एवं बीमारियों का कम प्रकोप होता है। इसमें मुख्यत: मिली बग और जड़सड़न रोग होने की संभावना रहती है। इसके रोकथाम के लिए उचित कीटनाशक का व्यवहार करना चाहिए एवं जड़ सड़न से बचने के लिए रोपने के पूर्व पुत्तलों की जड़ों की पास पीली पत्तियों को हटा देना चाहिए तथा पोटाशियम परमैगनेट के 5 प्रतिशत या एगेलौल के घोल में छोटे सिरे को डुबोकर 4-5 दिनों तक उन्हें धुप में सुखाना चाहिए।