मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र ने अपने प्रमुख फसल बीमा योजना में अधिक धनराशि को महत्तव देने के बावजूद किसानों के बीच में गिरावट आई है, जो किसानों के इस योजना के प्रति रूचि कम होने के संकेत हैं।


सरकार ने लोकसभा को बताया की प्रधान मंत्री की फसल बीमा योजना के अंतर्गत आने वाले किसानों (या खेत की होल्डिंग) की संख्या 2017-18 में 47.9 मिलियन हो गई, जो पिछले साल 57.5 मिलियन से अधिक थी , केवल एक साल में 17% की गिरावट दर्ज की गयी हैं । आंकड़े आगे बताते हैं 2017-१८ में कर्जदार किसानों की संख्या 44 मिलियन से गिरकर 35 मिलियन हो गई हैं , इस अवधि में गैर-ऋणदाता किसानों मामूली गिरावट आई, जो इस अवधि में 14 मिलियन से 13 मिलियन हो गयी हैं ।


2016 और 2017 में, कुल मिलाकर, दक्षिण-पश्चिम मानसून जो सामान्य के पास था वह भारत के फसल क्षेत्र मैं आधे से अधिक सिंचाई करता हैं। इसका मतलब कि किसानों के बीमा में तेजी का पता लगाने में बारिश की कोई भूमिका नहीं थी।


सरकार ने राज्यसभा 9 मार्च को बताया की पिछले एक साल में कंपनी की कुल संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जबकि 2017-18 में बीमा कंपनियों द्वारा एकत्रित सकल प्रीमियम का अनुमान 24,352 करोड़ रुपये है, जो सालाना 22,180 करोड़ रुपये से 9.8 फीसदी अधिक है।


बीमा कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, "यह संभव नहीं है कि 2016-17 में 30% कवरेज के मुकाबले में 2017-18 में बीमा कवरेज में सुधार होगा।" "2018-19 तक सकल फसली क्षेत्र के 50% को कवर करने के सरकार के लक्ष्य को हासिल करना एक बेहद मुश्किल काम होगा।


अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकारों की वजह से प्रीमियम को 40% से कम बीमा कंपनियों तक पहुंच गया है और किसान देरी से जूझ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र ने मार्च (2017-18) को समाप्त हुए चालू वर्ष में किसानों द्वारा दायर किए गए कुल दावों की गणना नहीं की है, जो दावों के निपटान में लंबे समय से देरी का संकेत है।


"पिछले कुछ सालों में कृषि ऋण में वृद्धि दर तेजी से गिर गई और बढ़ते कर्जबाजारी और किसानों द्वारा ऋण चुकाने में देरी की वजह से कर्ज माफी से लाभ की उम्मीद कम है । यह हो सकता है कि बैंक कम ऋण जारी कर रहे हैं। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर हिमांशू ने कहा, यह ऋण देने वाले खातों की संख्या कम कर सकता है और इसलिए, (अनिवार्य) फसल बीमा नामांकन संख्याओं को कम कर सकता है । उन्होंने कहा की इसमें हो रही देरी के कारण अन्य किसानो का रुझान इसकी तरफ कम हो रहा हैं।


जुलाई-2017 में दिल्ली-आधारित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट और दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के लिए इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च द्वारा जारी एक अध्ययन मैं प्रधान मंत्री की फसल बीमा योजना से जुडी समस्या के बारे मैं बताया गया था। प्रधान मंत्री की फसल बीमा योजना के मूल्यांकन में देरी जैसी समस्याएं हैं ,फसल के नुकसान और दावे निपटना , बीमा कंपनियों द्वारा लगाए गए उच्च बीमा प्रीमियम और इस योजना की निगरानी करने वाले अधिकारियों की कमी को अध्यन द्वारा उजागर किया गया है। प्रधान मंत्री की फसल बीमा योजना कृषि विभाग के बजट का एक तिहाई (2018-19 के बजट में 13,000 करोड़ रुपये) हिस्सा है ।